एक मीडिया इंटरव्यू / सार्वजनिक बातचीत के दौरान दिया था।
इस बातचीत का वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद मामला तूल पकड़ गया।
बयान किसी धार्मिक मंच से नहीं, बल्कि मीडिया से बातचीत और बाद में सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो के ज़रिए सामने आया। इसी वायरल बयान के आधार पर किन्नर अखाड़े ने संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की।
विवादित बयान के बाद ममता कुलकर्णी किन्नर अखाड़े से बाहर
धार्मिक जगत में एक नया विवाद सामने आया है। अभिनेत्री ममता कुलकर्णी को किन्नर अखाड़े ने संगठन से बाहर कर दिया है। यह कार्रवाई अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े विवाद पर दिए गए उनके बयान के बाद की गई है।
दरअसल, ममता कुलकर्णी ने हाल ही में एक बयान में कहा था कि
“10 में से 9 महामंडलेश्वर झूठे हैं”।
उनके इस बयान को साधु-संत समाज और अखाड़ा परंपरा के खिलाफ माना गया, जिसके बाद किन्नर अखाड़े में नाराज़गी फैल गई।
किन्नर अखाड़े के पदाधिकारियों का कहना है
कि इस तरह के बयान से सनातन परंपराओं, साधु-संतों और अखाड़ा व्यवस्था की गरिमा को ठेस पहुंचती है। अखाड़े ने स्पष्ट किया कि संगठन अनुशासन और मर्यादा के तहत चलता है, और कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक रूप से इस तरह की टिप्पणी करता है तो उस पर कार्रवाई तय है।
अखाड़े की आंतरिक बैठक के बाद यह निर्णय लिया गया किममता कुलकर्णी को तत्काल प्रभाव से किन्नर अखाड़े से निष्कासित किया जाए।
इस पूरे मामले के बाद धार्मिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। वहीं, ममता कुलकर्णी की ओर से अभी तक इस निष्कासन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक पदों और महामंडलेश्वरों को लेकर दिए जाने वाले सार्वजनिक बयानों की सीमाएं क्या होनी चाहिए।
धार्मिक समुदाय और संत-वादियों की प्रतिक्रियाएँ
कई संतों और धार्मिक समूहों ने ममता कुलकर्णी के बयान पर नाराज़गी जताई है, यह कहते हुए कि धार्मिक पदों और संत समाज पर तेज़ टिप्पणियाँ विवाद पैदा कर सकती हैं। कुछ ने कहा कि साधु-संप्रदायों और परंपराओं के प्रति सम्मान दिखाना ज़रूरी है।
संत समाज के नेता
किन्नर अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर ने कहा कि ममता के बयान उनके व्यक्तिगत विचार थे, लेकिन अखाड़ा की रवायत और मर्यादा के अनुरूप नहीं थे। उन्होंने संत समाज की गरिमा और परंपरा का सम्मान ज़रूरी बताया।
कुछ व्यक्तियों का सामाजिक रुख
ट्रांसजेंडर एक्टिविस्टों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में से कुछ ने कहा कि लोगों को पदों और बाहरी रूप से पहचानने की बजाय योग्यता और सम्मान पर ज़ोर देना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक सामाजिक कार्यकर्ता ने यह कहा कि केवल बाहरी वस्त्र या दुपट्टा ओढ़ने से कोई संत नहीं बन जाता।
धर्म-समुदाय के कुछ हिस्सों में चिंता
कुछ धार्मिक नागरिकों और समूहों ने कहा कि इस तरह के सार्वजनिक बयान धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा सकते हैं
और इससे सामाजिक माहौल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी चर्चाएँ आम सामाजिक प्लेटफ़ॉर्म पर देखी जा रही हैं लेकिन कोई सभी हिंदुओं का एक सामान्य बयान नहीं है — प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग व्यक्तियों और समूहों की ओर से हैं।
